शनिवार, 16 जनवरी 2021

About Shri Giriraj Bhawan


श्री ललित बिहारी विहारिणी जू सरकार
श्री गिर्राज भवन अर्थात श्री गिरिराज भवन 

जिसके प्रतीकात्मक स्वरूप इस प्रकार होगा । 

मुख्य ठाकुर जी श्री ललित बिहारी बिहारीनी जू सरकार





प्रतीक चिन्ह:  नीचे प्रस्तुत फोटो जिसमें 

श्री ललित बिहारी बिहारीनी जू पान का भोग लगाते है । तथा  खिलते हुए कमल में विराजमान है ।

प्रतीक गान :गोवर्धन वासी सावरे तुम बिन रहयो न जाए ।।



ध्वज पताका :पीत ध्वज (प्रथम फॉर्मेट)


पत्र: श्वेत पत्र तथा पीत पत्र 


भोर स्तुति : जय जय सुर नायक ....


गौधुलि स्तुति : जय राम रमा रम रम शरणम !!


वाक्य: श्री ललित बिहारी विहारिनी जू विजयते


भाव: सर्व महत्मन समभाव ।।


पुष्प: कमल पुष्प


निर्माण कार्य प्रारंभ तथा स्थापना द्वारा श्री गिर्राज जी महाराज :तथा  श्री श्री १००९ श्री महामंडलेशवर श्री मिथिला शरण दास जी महाराज के कर कमलों से 

संचालन : श्री ललित बिहारी बिहारनी जू द्वारा 

सेवाएं : गौ सेवा तथा संत सेवा, ठाकुर सेवा

मुख्य महन्त : सकेतवासी परमपूज्य श्री संजय कुमार अध्वर्यु जी


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हमारी ललित बिहारी सरकार का गिरिराज भवन छवि


मुख्य स्तुति

छन्द:

जय राम रमारमणं समनं | भव ताप भयाकुल पाहि जनं ||

अवधेस सुरेस रमेस विभो | सरनागत मागत पाहि प्रभो ||१||


दस सीस बिनासन बीस भुजा | कृत दूरी महा माहि भूरी रुजा |

रजनीचर बृंद पतंग रहे | सर पावक तेज प्रचंड दहे ||२||


महि मंडल मंडन चारूतरं | धृत सायक चाप निषंग बरं |

मद मोह महा ममता रजनी | तम पुंज दिवाकर तेज अनी ||३||


मनजात किरात निपात किए | मृग लोग कुभोग सरेन हिए |

हति नाथ अनाथनि पाहि हरे | विषया बन पाँवर भूली परे ||४||


बाहु रोग बियोगन्हि लोग हए |भवदंध्री निरादर के फल ए |

भव सिंधु अगाध परे नर ते | पद पंकज प्रेम न जे करते ||५||


अति दीन मलीन दुखी नितहीँ | जिन्ह के पद पंकज प्रीती नहीं |

अवलंब भवंत कथा जिन्ह कें | प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें ||६||


नहीं राग न लोभ न मान मदा | तिन्ह कें सम वैभव वा विपदा |

एहि ते तव सेवक होत मुदा | मुनि त्यागत जोग भरोस सदा ||७||


करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ |पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ |

सम मानी निरादर आदरही | सब संत सुखी बिचरंति महि ||८||


मुनि मानस पंकज भृंग भजे | रघुवीर महा रनधीर अजे |

तव नाम जपामि नमामि हरी | भव रोग महागद मान अरी ||९||


गुन सील कृपा परमायतनं | प्रनमामि निरंतर श्रीरमणं |

रघुनंदन निकंदय द्वन्दधनं | महि पाल बिलोकय दीन जनं ||१०||


दोहा:


बार बार बर मांगऊ हारिशी देहु श्रीरंग |

पदसरोज अनपायनी भागती सदा सतसंग ||

बरनी उमापति राम गुन हरषि गए कैलास |

तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास||




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